नालों की सफाई हर साल रहती है अधूरी

Delhi NCR

मानसून पूर्व नालों की सफाई हर साल ही अधूरी रहती है। कभी भी न तो नगर निगम के सभी नाले साफ हो पाते हैं, न लोक निर्माण विभाग के और न ही किसी अन्य एजेंसी के अधीन आने वाले नाले। नतीजा बारिश के दौरान जगह-जगह जलभराव होता है। नालों की गाद भी परेशानी का सबब बनती है। इस साल भी कमोबेश यही स्थिति है। अब तो दो बार से लाकडाउन व कामगारों के नहीं होने की एक नई वजह भी विभागों को मिल गई है।

दरअसल समस्या की मुख्य जड़ जवाबदेही का अभाव और नगर निगम एवं दिल्ली सरकार के बीच आपसी समन्वय का ना होना है। दिल्ली में समय पर नालों की सफाई नहीं हो पाने का मसला नया नहीं है। यह तो दशकों से चला आ रहा है, लेकिन ना कभी किसी अधिकारी के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई हुई, ना ही ठेकेदारों को काली सूची में डाला गया। सख्त कार्रवाई ना होने से किसी के मन में कोई भय भी नहीं रहता। इसी तरह नगर निगम और लोक निर्माण विभाग के बीच नालों की सफाई को लेकर सामंजस्य होना तो दूर, सीमा विवाद व अधिकार क्षेत्र का मुद्दा ही हमेशा सुर्खियों में बना रहता है।

दो करोड़ लोगों के हिसाब से बने ड्रेनेज सिस्टम : एक कड़वा सच यह भी है कि दिल्ली का ड्रेनेज सिस्टम 1957 में तब तैयार किया गया था जब यहां की आबादी महज 30 लाख थी। आज यह आबादी बढ़कर दो करोड़ के आसपास पहुंच गई है, लेकिन ड्रेनेज सिस्टम आज भी वही है। यही वजह है कि दिल्ली के नाले हमेशा ओवरफ्लो रहते हैं। मानसून के दिनों में स्थिति और बिगड़ जाती है। अनधिकृत कालोनियों का सीवरेज और रिवर बेड एरिया का अतिक्रमण भी इस समस्या को बढ़ा रहा है। इसके अलावा भ्रष्टाचार भी इस समस्या की जड़ है। दरअसल, नालों की सफाई का काम आउटसोìसग के जरिये यानी प्राइवेट ठेकेदारों से कराया जाता है। चूंकि यह ठेका लाखों-करोड़ों रुपये का होता है तो इसमें कमीशनखोरी भी खूब चलती है। इसमें नेता और अधिकारी दोनों की मिलीभगत रहती है। इस मिलीभगत के कारण ही दोषी ठेकेदारों पर कभी कोई कार्रवाई नहीं की जाती। देर सवेर उन्हें भुगतान भी पूरा कर दिया जाता है।

समीक्षा बैठक में हो जवाब तलब : बेशक दिल्ली में मानसून की दस्तक जून के आखिर या जुलाई की शुरुआत में होती है, लेकिन नालों की सफाई का काम मार्च अप्रैल में ही शुरू हो जाना चाहिए। हर क्षेत्र के नालों की सफाई सुनिश्चित करने के लिए वहां एक-एक अधिकारी को नोडल अफसर भी बनाया जाना चाहिए। हर सप्ताह इनसे प्रगति रिपोर्ट ली जाए और बीच-बीच में समीक्षा बैठक भी हो। नगर निगम या लोक निर्माण विभाग में से जिसके पास अच्छी तकनीक हो, दूसरे को भी उसका अनुसरण करने में कोई हिचक नहीं रखनी चाहिए। अगर किसी एक विभाग को कहीं कोई अच्छा या बुरा अनुभव पेश आए तो दूसरे को भी उससे सबक लेना चाहिए। जिला अधिकारी, उपायुक्त, अतिरिक्त आयुक्त, महापौर और मंत्री तक की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। सभी अपने-अपने क्षेत्रधिकार में न केवल मौका मुआयना करें बल्कि समीक्षा भी करते रहें। सिर्फ नालों की सफाई ही पर्याप्त नहीं है, यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि नालों से निकाली गई गाद बारिश शुरू होने से पहले उठा ली जाए। होता क्या है कि पहले तो यह कहकर इस गाद को छोड़ दिया जाता है कि सूखने पर उठाई जाएगी, लेकिन बाद में लापरवाही के चलते कोई उसे उठाता ही नहीं और गाद वापस नालों में पहुंच जाती है।

जगहों को चिन्हित कर एक्शन प्लान से बनेगी बात : मानसून पूर्व की पहली बारिश के बाद ही स्थिति का आकलन करना चाहिए कि कहां-कहां जलभराव हुआ और कहां पर नालों का पानी सड़क पर आ गया। जहां कहीं भी कमियां सामने आए, उसे मानसून आने से पहले दुरुस्त करवा दिया जाए। यह सारी प्रक्रिया जिम्मेदारी व जवाबदेही तय करने से ही पूरी हो पाएगी, अन्यथा नहीं। दृढ़ इच्छाशक्ति और कार्रवाई करने का साहस होना बेहद जरूरी है। हालांकि, इस साल नालों की सफाई न हो पाने की एक बड़ी वजह दो माह तक चला लाकडाउन और बाद में मजदूरों का अपने गृह प्रदेश वापस चले जाना भी रहा है। ऐसे में इस बार तो हाट स्पाट चिन्हित करके उनके लिए ही एक्शन प्लान बनाकर मानसून का सीजन निकाला जाना चाहिए।

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